Gramin Bank Dongripali : कागजी विकास की दीवार पर सिसकती मां, डोंगरीपाली ग्रामीण बैंक बना ‘आंसुओं का कसाईखाना’
KCC Loan Issue Chhattisgarh : सरकार की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘किसान सशक्तिकरण’ (Gramin Bank Dongripali) वाली चमचमाती योजनाओं के बड़े-बड़े, रंग-बिरंगे विज्ञापन और होर्डिंग्स हर सरकारी दफ्तर की दीवारों पर चिपके हैं। वातानुकूलित कमरों में बैठे हुक्मरान और मंचों से चिल्लाते नेता दावा करते हैं कि देश बदल रहा है और अब गरीबों को बैंकों के चक्कर नहीं काटने पड़ते।
अगर आपको इन दावों की असली, बदसूरत और डरावनी जमीनी हकीकत देखनी हो, तो सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला विकासखंड के अंतर्गत आने वाले छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक की शाखा डोंगरीपाली (Gramin Bank Dongripali) चले आइए। यहां की चौखट पर कदम रखते ही आपको समझ आ जाएगा कि कैसे सरकारी कागजों का विकास एक गरीब के आंसुओं में बह जाता है।
यहां ग्राम परसकोल की एक बेबस, लाचार और ममता की मारी मां सोनाफुल रावत (पति थबीर रावत), पिछले कई महीनों से अपने आंसुओं से इस बैंक (Gramin Bank Dongripali) की फर्श को भिगो रही है। वह यहां किसी के सामने हाथ फैलाकर भीख या खैरात मांगने नहीं आई है। वह अपनी ही जमीन, अपने पसीने से सींची गई मिट्टी के एवज में अपने हक का किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) लोन मांगने आई है। लेकिन डोंगरीपाली बैंक का यह दफ्तर आज एक बैंक नहीं, बल्कि गरीब किसानों की उम्मीदों और आंसुओं का कसाईखाना बन चुका है, जहां रोज एक मां की ममता और आत्मसम्मान की बलि चढ़ाई जा रही है।
23 जून को बेटी की शादी Gramin Bank Dongripali
आने वाली 23 जून 2026 को बेटी के हाथ पीले होने हैं। विडंबना देखिए, जिस घर में इस वक्त खुशियों का माहौल होना चाहिए था, मंडप की तैयारियां होनी चाहिए थीं, मंगलगीत गूंजने चाहिए थे और शहनाई की गूंज होनी चाहिए थी, वहां आज सिर्फ और सिर्फ मातम जैसा सन्नाटा पसरा है। पूरा परिवार गहरे सदमे और खौफ में जी रहा है।
बैंक मैनेजर (Gramin Bank Dongripali) सरोत्तम मालव की अमानवीयता, क्रूरता और संवेदनहीनता ने इस गरीब परिवार की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है। मां की आंखें रोते-रोते पथरा चुकी हैं, गालों पर आंसुओं के सूख चुके निशान उसकी बेबसी की गवाही दे रहे हैं। वह हाथों में बेटी की शादी का पीला कार्ड पकड़े बैंक के गलियारे में हर आने-जाने वाले साहब के सामने गिड़गिड़ा रही है, पर उस AC केबिन में बैठे मैनेजर का दिल मोम का नहीं, पत्थर का निकला।
आखिरकार किसके लिए चला रहे बैंक Gramin Bank Dongripali
सबसे बड़ा और तीखा सवाल तो यह उठता है कि आखिर इन सरकारी बैंकों को जनता की सहूलियत और अन्नदाताओं की मदद के लिए खोला गया है, या फिर घमंडी अफसरों को कुर्सी पर बैठाकर गरीब, सीधे और अनपढ़ ग्रामीणों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए? जब देश का एक किसान, एक मां अपनी बेटी की इज्ज्त और डोली उठाने के लिए एक अदने से बैंक मैनेजर के सामने घुटनों के बल बैठने को मजबूर हो जाए, तो समझ लीजिए कि हमारा लोकतंत्र और हमारी प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह से वेंटिलेटर पर आ चुकी है।
मैनेजर के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही
शादी की तारीख सिर पर खड़ी है, दिन पानी की तरह बह रहे हैं, लेकिन मैनेजर साहब के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। क्या एक गरीब मां का अपनी बेटी की शादी धूमधाम से करने का सपना देखना कोई गुनाह है? इस रोती हुई बेबस मां के आंसुओं का हिसाब आखिर कौन देगा? यह तंत्र कब तक इन तानाशाह अफसरों की ढाल बना रहेगा? ज़िला प्रशासन और आला अधिकारियों को अब अपनी कुंभकर्णी नींद से जागना ही होगा, वरना इतिहास इस क्रूरता के लिए कभी माफ नहीं करेगा।
यह इस श्रृंखला का पहला एपिसोड है। अगले एपिसोड में हम बेनकाब करेंगे मैनेजर सरोत्तम मालव के उस अहंकार और उन बयानों को, जिसने मानवीय संवेदनाओं का सरेआम कत्ल कर दिया। पढ़ते रहिए…